Tuesday, 14 February 2017

कौरवों के जन्म पर मिले अशुभ संकेत ।


धृतराष्ट्र जन्मजात नेत्रहीन थे, मगर उनकी पत्नी गांधारी अपनी इच्छा से नेत्रहीन थी। धृतराष्ट्र चाहते थे कि उनके भाइयों की संतान होने से पहले उनको संतान हो जाए क्योंकि नई पीढ़ी का सबसे बड़ा पुत्र ही राजा बनता। उन्होंने गांधारी से खूब प्रेमपूर्ण बातें कीं ताकि वह किसी तरह एक पुत्र दे सके। आखिरकार गांधारी गर्भवती हुई। महीने गुजरते गए, नौ महीने दस में बदले, ग्यारह महीने हो गए, मगर कुछ नहीं हुआ। उन्हें घबराहट होने लगी। फिर उन्हें पांडु के बड़े पुत्र युधिष्ठिर के जन्म की खबर मिली। धृतराष्ट्र और गांधारी तो दुख और निराश में डूब गए।

चूंकि युधिष्ठिर का जन्म पहले हुआ था इसलिए स्वाभाविक रूप से राजगद्दी पर उसी का अधिकार था। ग्यारह, बारह महीने बीतने के बाद भी गांधारी बच्चे को जन्म नहीं दे पा रही थी। वह बोली, ‘यह क्या हो रहा है? यह बच्चा जीवित भी है या नहीं?

यह इंसान है या कोई पशु?’ हताशा में आकर उसने अपने पेट पर मुक्के मारे, मगर कुछ नहीं हुआ। फिर उसने अपने एक नौकर को एक छड़ी लाकर अपने पेट पर प्रहार करने को कहा। उसके बाद, उसका गर्भपात हो गया और मांस का एक काला सा लोथड़ा बाहर आया। लोग उसे देखते ही डर गए क्योंकि वह इंसानी मांस के टुकड़े जैसा नहीं था। वह कोई बुरी और अशुभ चीज लग रही थी।

अशुभ संकेत मिलने लगे

अचानक पूरा हस्तिनापुर शहर डरावनी आवाजों से आतंकित हो उठा। सियार बोलने लगे, जंगली जानवर सड़क पर आ गए, दिन में ही चमगादड़ उड़ने लगे। ये शुभ संकेत नहीं थे और इसका मतलब था कि कुछ बुरा होने वाला है। इसे देखकर ऋषि-मुनि हस्तिनापुर से दूर चले गए। चारों ओर यह खबर फैल गई कि वहां से सारे ऋषि चले गए हैं। विदुर ने आकर धृतराष्ट्र से कहा, ‘हम सब बहुत बड़ी मुसीबत में पड़ने वाले हैं।’ धृतराष्ट्र संतान के लिए इतने उत्सुक थे कि उन्होंने कहा, ‘जाने दो।’ वह देख नहीं सकते थे, इसलिए उन्होंने पूछा, ‘क्या हुआ है? हर कोई चीख-चिल्ला क्यों रहा है और यह सारा शोर किसलिए है?’

फिर गांधारी ने व्यास को बुलाया। एक बार जब व्यास ऋषि एक लंबी यात्रा से लौटे थे तो गांधारी ने उनके जख्मी पैरों में मरहम लगाया था और उनकी बहुत सेवा की थी। तब उन्होंने गांधारी को आशीर्वाद दिया था, ‘तुम जो चाहे मुझसे मांग सकती हो।’

गांधारी बोली, ‘मुझे सौ पुत्र चाहिए।’ व्यास बोले, ‘ठीक है, तुम्हारे 100 पुत्र होंगे।’ अब गर्भपात के बाद गांधारी ने व्यास को बुलाया और उनसे कहा, ‘यह क्या है? आपने तो मुझे 100 पुत्रों का आशीर्वाद दिया था। उसकी बजाय मैंने मांस का एक लोथड़ा जन्मा है, जो इंसानी भी नहीं लगता, कुछ और लगता है। इसे जंगल में फेंक दीजिए। कहीं पर दफना दीजिए।’

व्यास बोले, ‘आज तक मेरी कोई बात गलत नहीं निकली है, न ही अब होगी। वह जैसा भी है, मांस का वही लोथड़ा लेकर आओ।’ वह उसे तहखाने में लेकर गए और 100 मिट्टी के घड़े, तिल का तेल और तमाम तरह की जड़ी-बूटियों को लाने के लिए कहा। उन्होंने मांस के उस टुकड़े को 100 टुकड़ों में बांटा और उन्हें घड़ों में डालकर बंद करके तहखाने में रख दिया। फिर उन्होंने देखा कि एक छोटा टुकड़ा बच गया है। वह बोले, ‘मुझे एक और घड़ा लाकर दो। तुम्हारे 100 बेटे और एक बेटी होगी।’ उन्होंने इस छोटे से टुकड़े को एक और घड़े में डाल कर सीलबंद कर दिया और उसे भी तहखाने में डाल दिया। एक और साल बीत गया। इसीलिए कहा जाता है कि गांधारी दो सालों तक गर्भवती रही थी – गर्भ एक साल उसकी कोख में और दूसरे साल तहखाने में था।

Monday, 13 February 2017

श्री कृष्ण और राधा ।


हालांकि कृष्ण और राधा ने बचपन के कुछ ही साल साथ-साथ गुजारे, फिर भी आज हजारों साल बाद भी हम उन दोनों को अलग-अलग करके नहीं देख पाते। ऐसा कौन सा जादू था उस रिश्ते में?

जब कृष्ण ने गोपियों के कपड़े चुराए तो यशोदा माँ ने उन्हें बहुत मारा और फिर ओखली से बांध दिया। कृष्ण भी कम न थे। मौका मिलते ही उन्होंने ओखली को खींचा और उखाड़ लिया और फौरन जंगल की ओर निकल पड़े, क्योंकि वहीं तो उनकी गायें और सभी सथी संगी थे।

अचानक जंगल में उन्हें दो महिलाओं की आवाजें सुनाईं दीं। कृष्ण ने देखा वे दो बालिकाएं थीं, जिनमें से छोटी वाली तो उनकी सखी ललिता थी और दूसरी जो उससे थोड़ी बड़ी थी, उसे वह नहीं जानते थे, लेकिन लगभग 12 साल की इस लड़की की ओर वह स्वयं ही खिंचते चले गए।

16 साल की उम्र के बाद कृष्ण राधा से कभी नहीं मिले। लेकिन सात से सोलह साल की उम्र तक, राधा के साथ गुजारे उन नौ सालों में राधा हमेशा के लिए कृष्ण का हिस्सा बन गई।

दोनों लड़कियों ने उनसे पूछा कि क्या हुआ? तुम्हें इस तरह किसने बांध दिया? यह तो बड़ी क्रूरता है! किसने किया यह सब? उन दोनों में जो 12 वर्षीय लड़की थी, उसका नाम राधे था। जिस पल राधे ने सात साल के कृष्ण को देखा, उसके बाद वे कभी उनकी आँखों से ओझल नहीं हुए। जीवन भर कृष्ण राधे की आँखों में रहे, चाहे वह शारीरिक तौर पर उनके साथ हों या न हों। हालांकि बचपन के कुछ ही साल उन दोनों ने साथ-साथ गुजारे थे, फिर भी आज हजारों साल बाद भी हम राधा और कृष्ण को अलग-अलग करके नहीं देख पाते।

राधा

16 साल की उम्र के बाद कृष्ण पूरे जीवन राधा से कभी नहीं मिले। लेकिन सात साल की उम्रसे लेकर 16 साल तक के उन नौ सालों में, जो उन्होंने राधे के साथ गुजारे, राधे उनका एक हिस्सा बन गईं। वह जीवन में बहुत सारे लोगों से मिले, बहुत सारे काम किए। उन्होंने कई विवाह भी किए, लेकिन राधे उनके जीवन में हमेशा बनी रहीं। राधा के शब्दों में, “मैं उनमें रहती हूं और वह मुझमें। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि वह कहां हैं और किसके साथ रहते हैं। वह हमेशा मेरे साथ हैं। कहीं और वह रह ही नहीं सकते।“ यानी जिस पल उन दोनों ने एक दूसरे को देखा था, उसके बाद से उन्हें एक दूसरे से अलग करके नहीं देखा गया। आज करीब तीन हजार साल बाद भी आप उन्हें अलग करके नहीं देख सकते। कुछ आचारी धार्मिक लोगों ने इतिहास में कुछ जगहों पर इन दोनों को अलग करने की कोशिश की। उन्होंने राधे को अलग करने की कोशिश की, क्योंकि राधे महाभारत की बदचलन लड़की है। वह सामाजिक ताने-बाने में फिट नहीं बैठती। इसलिए वे राधे को कृष्ण से अलग करके कृष्ण को ज्यादा ईश्वरीय स्वरूप में प्रस्तुत करना चाहते थे। लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद वे राधा को कृष्ण के जीवन से बाहर नहीं कर सके।

कृष्ण को अपनी बांसुरी पर बड़ा गर्व था। राधे से अलग होते समय कृष्ण ने न सिर्फ अपनी बांसुरी राधे को दे दी, बल्कि उसके बाद जीवन में फिर कभी उन्होंने बांसुरी नहीं बजाई।

खैर, राधे ने कृष्ण को लकड़ी की ओखली से खोलने की कोशिश की। मगर कृष्ण उन्हें रोक दिया और कहा, ‘इसे मत खोलो। मैं चाहता हूं कि इसे मां ही खोले, जिससे उनका गुस्सा निकल सके।’ इन लड़कियों ने पूछा, ‘क्या हम तुम्हारे लिए कुछ और कर सकते हैं?’ इस पर कृष्ण ने अपनी सखी ललिता से कहा, ‘मुझे पानी चाहिए। मेरे लिए पानी ले आओ।’ दरअसल, पानी के बहाने वह उसे वहां से हटाना चाहते थे। ललिता पानी लेने चली गई और सात साल के कृष्ण और 12 साल की राधा साथ-साथ बैठ गए। इस एक मुलाकात में ही ये दोनों एक दूसरे में विलीन होकर एक हो गए और फिर उसके बाद से उन्हें कोई अलग न कर सका।
कृष्ण जब 16 साल के हुए, जिंदगी ने उनके रास्ते बदल दिए। कृष्ण को अपनी बांसुरी पर बड़ा गर्व था। उनकी बांसुरी थी ही इतनी मंत्रमुग्ध कर देने वाली। लेकिन 16 साल की उम्र में जब वह शारीरिक तौर से राधे से अलग हुए, तो उन्होंने न सिर्फ अपनी बांसुरी राधे को दे दी, बल्कि उसके बाद जीवन में फिर कभी उन्होंने बांसुरी नहीं बजाई।

Sunday, 12 February 2017

भगवान राम से जब न्याय मांगने आया एक कुत्ता!


भारत में राम राज्य को सबसे न्यायपूर्ण व्यवस्था माना जाता है। राम और सीता की कहानी तो भारत में सबने सुनी है जिसमे राम सीता को रावन से बचाते हैं लंका पर आक्रमण करके। पूरी रामायन यही तो है। लेकिन वानर सेना और हनुमान जी से मिलने से पहले, यहाँ तक की अयोध्या से वनवास लेने से पहले श्री राम अपने भाई लक्ष्मण के साथ जनता को न्याय देते थे। जानें भगवान राम राज्य से जुडी एक रोचक घटना के बारे में जो राम और रावण युद्ध से पहले, राम चरित मानस से पहले की है…

राम के न्याय की अनोखी कहानी

 पुराणों में राम के बारे में एक बहुत ही सुंदर कहानी है। प्राचीन काल में इस देश के उत्तरी भाग में एक बहुत प्रसिद्ध मठ था जिसे कालिंजर के नाम से जाना जाता था। कालिंजर मठ उस समय का एक प्रसिद्ध मठ था। यह रामायण काल से पहले की बात है। रामायण का मतलब है, लगभग 5000 साल पहले। राम के आने से पहले भी कालिंजर मठ का खूब नाम था। राम को बहुत न्यायप्रिय और कल्याणकारी राजा माना जाता था। वह हर दिन दरबार में बैठकर लोगों की समस्याएं हल की कोशिश करते थे। एक दिन शाम को, जब दिन ढल रहा था, उन्हें दरबार की कार्यवाही समेटनी थी। जब वह सभी लोगों की समस्याएं सुन चुके थे, तो उन्होंने अपने भाई लक्ष्मण, जो उनके परम भक्त थे, से बाहर जाकर देखने को कहा कि कोई और तो इंतजार नहीं कर रहा। लक्ष्मण ने बाहर जाकर चारो ओर देखा और वापस आकर बोले, ‘कोई नहीं है। आज का हमारा काम अब खत्म हो गया है।’ राम बोले, ‘जाकर देखो, कोई हो सकता है।’ यह थोड़ी अजीब बात थी, लक्ष्मण अभी-अभी बाहर से देख कर आ चुके थे, मगर वह फिर से जाकर देखने के लिए कह रहे हैं। इसलिए लक्ष्मण फिर से गए और चारो ओर देखा, वहां कोई नहीं था। 

वे अंदर आने ही वाले थे, तभी उनकी नजर एक कुत्ते पर पड़ी जो बहुत उदास चेहरा लिए बैठा था और उसके सिर पर एक चोट थी। तब उन्होंने कुत्ते को देखा और उससे पूछा, ‘क्या तुम किसी चीज का इंतजार कर रहे हो?’ कुत्ता बोलने लगा, ‘हां, मैं राम से न्याय चाहता हूं।’ तो लक्ष्मण बोले, ‘तुम अंदर आ जाओ’ और वह उसे दरबार में ले गए। कुत्ते ने आकर राम को प्रणाम किया और बोलने लगा। वह बोला, ‘हे राम, मैं न्याय चाहता हूं। मेरे साथ बेवजह हिंसा की गई है। मैं चुपचाप बैठा हुआ था, सर्वथासिद्ध नाम का यह व्यक्ति आया और बिना किसी वजह के मेरे सिर पर छड़ी से वार किया। मैं तो बस चुपचाप बैठा हुआ था। मैं न्याय चाहता हूं।’ राम ने तत्काल सर्वथासिद्ध को बुलवा भेजा जो एक भिखारी था। उसे दरबार में लाया गया। राम ने पूछा, ‘तुम्हारी कहानी क्या है? यह कुत्ता कहता है कि तुमने बिना वजह उसे मारा।’ सर्वथासिद्ध बोला, ‘हां, मैं इस कुत्ते का अपराधी हूं। मैं भूख से बौखला रहा था, मैं गुस्से में था, निराश था। यह कुत्ता मेरे रास्ते में बैठा हुआ था इसलिए मैंने बेवजह निराशा और गुस्से में इस कुत्ते के सिर पर मार दिया। आप मुझे जो भी सजा देना चाहें, दे सकते हैं।’

फिर राम ने यह बात अपने मंत्रियों और दरबारियों के सामने रखी और बोले, ‘आप लोग इस भिखारी के लिए क्या सजा चाहते हैं?’ उन सब ने इस बारे में सोचकर कहा, ‘एक मिनट रुकिए, यह बहुत ही पेचीदा मामला है। पहले तो इस मामले में एक इंसान और एक कुत्ता शामिल हैं, इसलिए हम सामान्य तौर पर जिन कानूनों को जानते हैं, वे इस पर लागू नहीं होंगे। इसलिए राजा होने के नाते यह आपका अधिकार है कि आप फैसला सुनाएं।’ फिर राम ने कुत्ते से पूछा, ‘तुम क्या कहते हो, क्या तुम्हारे पास कोई सुझाव है?’ कुत्ता बोला, ‘हां, मेरे पास इस व्यक्ति के लिए एक उपयुक्त सजा है।’ ‘वह क्या, बताओ?’ तो कुत्ता बोला, ‘इसे कालिंजर मठ का मुख्य महंत बना दीजिए।’ राम ने कहा, ‘तथास्तु।’ और भिखारी को प्रसिद्ध कालिंजर मठ का मुख्य महंत बना दिया गया। राम ने उसे एक हाथी दिया, भिखारी इस सजा से बहुत प्रसन्न होते हुए हाथी पर चढ़कर खुशी-खुशी मठ चला गया।

दरबारियों ने कहा, ‘यह कैसा फैसला है? क्या यह कोई सजा है? वह आदमी तो बहुत खुश है।’ फिर राम ने कुत्ते से पूछा, ‘क्यों नहीं तुम ही इसका मतलब बताते?’ कुत्ते ने कहा, ‘पूर्वजन्म में मैं कालिंजर मठ का मुख्य महंत था और मैं वहां इसलिए गया था क्योंकि मैं अपने आध्यात्मिक कल्याण और उस मठ के लिए सच्चे दिल से समर्पित था, जिसकी बहुत से दूसरे लोगों के आध्यात्मिक कल्याण में महत्वपूर्ण भूमिका थी। मैं वहां खुद के और हर किसी के आध्यात्मिक कल्याण के संकल्प के साथ वहां गया और मैंने इसकी कोशिश भी की। मैंने अपनी पूरी कोशिश की। मगर जैसे-जैसे दिन बीते, धीरे-धीरे दूसरे छिटपुट विचारों ने मुझे प्रभावित करना शुरू कर दिया। मुख्य महंत के पद के साथ आने वाले नाम और ख्याति ने कहीं न कहीं मुझ पर असर डालना शुरू कर दिया। कई बार मैं नहीं, मेरा अहं काम करता था। कई बार मैं लोगों की सामान्य स्वीकृति का आनंद उठाने लगता था। लोगों ने मुझे एक धर्मगुरु की तरह देखना शुरू कर दिया। अपने अंदर मैं जानता था कि मैं धर्मगुरु नहीं हूं मगर मैंने किसी धर्मगुरु की तरह बर्ताव करना शुरू कर दिया और उन सुविधाओं की मांग करना शुरू कर दिया, जो आम तौर किसी धर्मगुरु को मिलनी चाहिए। मैंने अपने संपूर्ण रूपांतरण की कोशिश नहीं की मगर उसका दिखावा करना शुरू कर दिया और लोगों ने भी मेरा समर्थन किया। ऐसी चीजें होती रहीं और धीरे-धीरे अपने आध्यात्मिक कल्याण के लिए मेरी प्रतिबद्धता घटने लगी और मेरे आस-पास के लोग भी कम होने लगे। कई बार मैंने खुद को वापस लाने की कोशिश की मगर अपने आस-पास जबर्दस्त स्वीकृति को देखते हुए मैं कहीं खुद को खो बैठा। इस भिखारी सर्वथासिद्ध में गुस्सा है, अहं है, वह कुंठित भी है, इसलिए मैं जानता हूं कि वह भी खुद को वैसा ही दंड देगा, जैसा मैंने दिया था। इसलिए यह उसके लिए सबसे अच्छी सजा है, उसे कालिंजर मठ का मुख्य महंत बनने दीजिए।’

Saturday, 11 February 2017

श्री कृष्ण की युद्ध नीति ।


सम्राट जरासंघ एक बहादुर योद्धा और एक प्रतिभाशाली व्यक्ति था। वह 45 सालों से अपने राज्य पर शासन कर रहा था और उसने कई लड़ाइयां जीतते हुए अपने राज्य का विस्तार किया था। मगर उसकी महत्वाकांक्षा समाप्त नहीं हुई थी। वह यह पक्का करना चाहता था कि उसके बच्चे और उनके बच्चे उस रियासत की सीमा को और आगे बढ़ाते रहें, जिसे उसने खड़ा किया था। वह पूरी निर्ममता से इस पर अमल करता था।

यदि 1947 में कृष्ण होते तो वह बिल्कुल अलग तरीके से इस मामले को सुलझाते। आज यह कोशिश करना कि कुछ लोग नहीं मारे जाएं और अगले 60 सालों तक देश को खून के आंसू रूलाना – कहीं ज्यादा बड़ी बेवकूफी है। लोग अपनी भावनाओं, सिद्धांतों और नैतिकताओं में अपना विवेक खो बैठे।

उसने अपनी दो बेटियों की शादी कंस से की क्योंकि वह उसे एक शक्तिशाली सहयोगी की तरह देखता था। उसे लगा कि ऐसा गठबंधन बनाने पर, भारत वर्ष का उत्तरी हिस्सा उसके अधीन हो जाएगा। उसे आर्य मर्यादा और धर्म का कोई ख्याल नहीं था।

जब कृष्ण ने कंस को मार डाला, तो यह सारी रणनीति बिगड़ गई। कुछ युद्ध लड़ने और कुछ और छोटे-छोटे राज्यों को मिलाने के बाद, जरासंध ने मथुरा को जीतने की योजना बनाई। मगर उस समय कृष्ण मथुरा के सभी लोगों के साथ मथुरा से कूच कर गए। गुस्से और हताशा में जरासंध ने खाली शहर में आग लगा दी। फिर वह अपने मित्र शिशुपाल की शादी रुक्मिणी से कराना चाहता था ताकि रुक्मिणी का भाई रुक्मी जो बहुत महत्वाकांक्षी युवक था और उसके पास एक शक्तिशाली सेना थी, वह उसके साथ आ जाए।

जरासंध बिहार से इतनी दूर गुजरात सिर्फ यह पक्का करने आया कि स्वयंवर में कोई गड़बड़ न हो। मगर वहां उसकी नाक के नीचे से कृष्ण रुक्मिणी को भगा कर ले गए। और जब उसने गोमांतक में कृष्ण को पकड़ने की कोशिश की तो कृष्ण ने उसे हरा दिया और उसे जीवनदान देते हुए शर्मिंदा कर दिया। जरासंध जैसे योद्धा के लिए इससे बदतर कुछ नहीं था कि एक ग्वाला उसे जीवनदान दे।  इससे बेहतर उसके लिए मर जाना था।

इसके बाद उसने अपने पौत्र की शादी द्रौपदी से करवाने की युक्ति सोची। इस तरह द्रौपदी के पिता राजा द्रुपद उसके सहयोगी बन जाते, जिनके पास एक विशाल सेना थी, और इस तरह वह भारत वर्ष के एक दूसरे इलाके पर नियंत्रण पा सकता था। बहुत कम लोग तीरंदाजी की उस बहुत मुश्किल कसौटी पर खरे उतर सकते थे, जिसे द्रुपद ने तय किया था। ये लोग थे, द्रोणाचार्य, दुर्योधन, अर्जुन, खुद जरासंध और शायद कृपाचार्य और अश्वत्थामा। मगर द्रोण और कृपाचार्य बूढ़े हो चुके थे और ब्राह्मण होने के नाते वे इसमें शामिल नहीं होते। कर्ण का वंश कुलीन नहीं था, इसलिए वह इस स्वयंवर में भाग नहीं ले सकता था, यहां जाति व्यवस्था थी।

जरासंध ने आकर उस जगह डेरा डाल दिया, जहां स्वयंवर होना था। वह जानता था कि उसका पौत्र इस तीरंदाजी के इम्तिहान में नहीं जीत सकता है, मगर वह खुद इसे जीत सकता था। कृष्ण ने हालात को ध्यान से देखा। उनका इरादा यह था कि द्रौपदी दुर्योधन से विवाह न करे। वह भी दुर्योधन से विवाह नहीं करना चाहती थी। मगर यदि दुर्योधन इस परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाता, तो द्रौपदी को उससे विवाह करना पड़ता। दुर्योधन के लिए काम करने वाले द्रोणाचार्य द्रौपदी को भावी महारानी के रूप में नहीं देखना चाहते थे क्योंकि उन्होंने दुर्योधन की पहली पत्नी भानुमती से वादा किया था कि वह द्रौपदी को महारानी नहीं बनने देंगे।

जरासंध के शिविर में बहुत सख्त पहरा था। आधी रात का समय था, तभी दो लोग शिविर में पहुंचे, जिन्होंने अपने चेहरे ढक रखे थे। पहरेदारों ने उन्हें रोक दिया। उनमें से एक व्यक्ति बोला, ‘हम सम्राट से मिलना चाहते हैं।’ पहरेदार बोला, ‘क्या तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है? आधी रात को तुम सम्राट से मिलना चाहते हो? ऐसा नहीं हो सकता। यहां से चले जाओ।’ वह व्यक्ति बोला, ‘अगर तुमने मुझे सम्राट से नहीं मिलने दिया, तो तुम मरोगे और तुम्हारे सम्राट को मुझसे न मिल पाने का जिंदगी भर अफसोस होगा।’ पहरेदार बोला, ‘तुम कुछ ज्यादा ही दु:साहसी लग रहे हो। वापस जाओ, सुबह आना।’ फिर उस व्यक्ति ने पूछा, ‘यहां की सुरक्षा की जिम्मेदारी किस राजकुमार के पास है? कम से कम उसे जगाओ।’ पहरेदार बोला, ‘नहीं। हम आधी रात को उन्हें नहीं जगा सकते।’ फिर यह व्यक्ति बोला, ‘अगर वह आज नहीं जगता, तो कल भी नहीं जाग पाएगा। जाकर अभी उसे उठाओ।’ फिर पहरेदारों ने जरासंध के एक पौत्र को जगाया, जिसके जिम्मे वहां की सुरक्षा थी। उसने आकर पूछा, ‘तुम कौन हो? इस व्यक्ति ने अपने चेहरे से कपड़ा हटाया और बोला, ‘मैं वासुदेव कृष्ण हूं।’ जरासंध का पौत्र हक्का-बक्का रह गया। कृष्ण तो उनका कट्टर दुश्मन था। वे उसकी तलाश में देश भर घूमे थे मगर उसे नहीं पकड़ पाए थे। और आज आधी रात को सिर्फ एक और शख्स के साथ वह उनके शिविर में आ पहुंचा था। वे चाहते थे तो अभी उसे मार सकते थे।

जरासंध के पौत्र को यकीन नहीं आ रहा था। मगर फिर उसने मुकुट और मोरपंख देखा और फिर सोचा, ‘अरे यह तो वाकई वही उपद्रवी ग्वाला है।’ फिर उसने नीला रंग देखा, ‘अरे यह तो बिल्कुल वही है।’ उसने पूछा, ‘तुम क्या चाहते हो?’ कृष्ण बोले, ‘मैं जरासंध से बात करना चाहता हूं। अगर तुम अभी उसे नहीं जगाते, तो बस एक संदेश दे दो कि मैं यहां उसका जीवन बचाने आया हूं। अगर मैं अभी उससे नहीं मिलता, तो मैं फिर कुछ नहीं कर पाउंगा। अगर फिर भी तुम उसे नहीं जगाना चाहते, तो मैं वापस चला जाता हूं। सब कुछ तुम्हारे ऊपर है।’ युवक थोड़ा परेशान हो गया, फिर बोला, ‘रुको।’ उसने जाकर जरासंध को जगाया जो उस समय एक 75 साल का बुजुर्ग था मगर अब भी काफी तंदुरुस्त और हट्टा-कट्ठा था। वह एक योद्धा था। उसे सूचना दी गई, ‘कृष्ण आपसे मिलने आए हैं।’ जरासंध को अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ, ‘क्या? वह आधी रात को मेरे शिविर में मुझसे मिलने आया है? उसकी इतनी हिम्मत?’ उसके दिमाग में तुरंत आया, ‘क्या हम अभी उसे मार डालें?’ फिर उसके पौत्र ने उसे बताया कि कृष्ण ने उससे क्या कहा। जरासंध को वे सभी घटनाएं याद आ गईं, जब कृष्ण उस पर भारी पड़े थे। इसलिए उसने सोचा कि निश्चित रूप से कृष्ण इतने मूर्ख नहीं हैं कि यूं ही वहां मौत के मुंह में आ जाएं। जरूर कुछ और बात होगी। इसलिए वह उनसे मिलने के लिए तैयार हो गया।

कृष्ण अंदर आए तो जरासंध बोला, ‘तुम इस तरह यहां आए हो, जैसे कोई मेमना बाघ की गुफा में आने की गुस्ताखी करता है, मगर ऐसा मेमना अगले दिन का सूरज नहीं देख पाता।’ कृष्ण ने वे सारी घटनाएं गिनाईं, जब उन्होंने जरासंध को अपमानित किया था। वे बोले, ‘इतनी सारी घटनाओं के बावजूद आपको लगता है कि मैं ऐसा मेमना हूं।’ जरासंध बोला, ‘ठीक है, ठीक है, बताओ।

क्या बात करने आए हो?’ कृष्ण ने समझाया, ‘आप द्रौपदी के स्वयंवर में आए हैं। हर किसी को पता है कि द्रौपदी से विवाह का मतलब द्रुपद से संबंध बनाना है। द्रुपद से संबंध का मतलब एक विशाल सेना से संबंध है। इसी वजह से इतने सारे राजा यहां जुटे हैं। सबसे बढ़कर द्रुपद की एक नेक इंसान के रूप में बहुत इज्जत है, जिससे आपकी प्रतिष्ठा और ताकत बढ़ सकती है। इसलिए आपके यहां आने का मकसद मेरे सामने बिल्कुल साफ है। आपका पौत्र यकीनन तीरंदाजी का इम्तिहान पास नहीं कर सकता, मगर आप कर सकते हैं।’ जरासंध बोला, ‘बिल्कुल। मैं जीतूंगा।’

कृष्ण बोले, ‘कल्पना कीजिए। अगर इतने सारे पुत्रों और पौत्रों वाले 75 वर्षीय आप अगर एक 18 वर्षीय युवती के लिए इस मुकाबले में शामिल होते हैं, तो आप उपहास के पात्र बन जाएंगे। चाहे आप यह मुकाबला जीत भी लें, लेकिन अगर कोई युवक भी इस मुकाबले को जीत लेता है, तो आपको उससे लड़ना होगा। इसमें आप मारे जा सकते हैं क्योंकि जो इंसान इस मुकाबले को जीतने के काबिल होगा, वह आपको मारने में भी सक्षम हो सकता है। अगर दुर्योधन ने यह मुकाबला जीता, तो वह आसानी से आपको मार सकता है। आप दोनों एक-दूसरे की टक्कर के हैं, मगर वह युवा है और आप बूढ़े। और अगर संयोग से आप मुकाबला हार गए तो आपका साम्राज्य बर्बाद हो जाएगा। कोई राजा आगे आपके साथ जुड़ना नहीं चाहेगा। मुझे यकीन है कि आप इतने बुद्धिमान होंगे कि ऐसा कदम नहीं उठाएंगे।’ जरासंध को बात समझ में आ गई।

कृष्ण आगे कहते रहे, ‘इसलिए निश्चित रूप से आप यहां मुकाबले में भाग लेने नहीं आए हैं। आप यहां उस लड़की का अपहरण करने आए हैं। ऐसा आप सिर्फ दो जगह कर सकते हैं। एक जगह वह है, जब वह दूसरी राजकुमारियों के साथ मंदिर आएगी। दूसरी जगह – जब वह विवाह कक्ष में प्रवेश करेगी।’ उन्होंने बताया, ‘इन दोनों जगहों पर मेरे सबसे धुरंधर लोग तैनात हैं। अगर आपका रथ निर्धारित मार्ग से थोड़ा भी भटका, तो तत्काल आपका सिर धड़ से अलग हो जाएगा। चाहे जिस तरह से भी, अगर आप अपनी किसी योजना पर अमल करने की कोशिश करेंगे, तो आपकी मौत तय है। आपके लिए सबसे अच्छा यही है कि आप द्रुपद को जो भी बढ़िया उपहार दे सकते हैं, देकर पूरी इज्जत से यहां से चले जाएं।’

जरासंध दहाड़ा, ‘तुम मुझे यह बताने वाले कौन होते हो कि मुझे क्या करना चाहिए? मैं मगध का सम्राट हूं, तुम सिर्फ एक ग्वाले हो।’ कृष्ण बोले, ‘इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कौन हैं और मैं कौन हूं। चाहे आप एक महान राजा हों, इस देश और संस्कृति पर मेरा असर आपसे कहीं ज्यादा है। लड़ने तथा लोगों को इकट्ठा करने की मेरी काबिलियत भी आपसे कहीं ज्यादा है। जैसा कि मैंने कहा, कल सुबह अगर आपका रथ अपने निर्धारित रास्ते से जरा सा भी इधर-उधर गया, तो आपका सिर धड़ से अलग हो जाएगा। अब यह आपके ऊपर है कि आप क्या चुनते हैं।’

जब कृष्ण वहां से जाने लगे, तो जरासंध ने पूछा, ‘अगर मैं तुम्हें यहीं मार डालूं तो?’ कृष्ण बोले, ‘मैंने सबसे शूरवीर 1000 यादव योद्धा महत्वपूर्ण जगहों पर तैनात कर दिए हैं। यही नहीं, आर्यावर्त के कानून के मुताबिक यदि कोई स्वयंवर में शामिल होने के लिए आने वाले किसी व्यक्ति को जान से मारता है, तो सभी राजा यह सुनिश्चित करते हैं कि उस हत्यारे को मृत्यु दंड मिले क्योंकि उसने मूल नियम तोड़ा है। स्वयंवर में मुकाबला तो होता है, मगर आखिरकार लड़की का फैसला ही अंतिम होता है। आर्यावर्त के सभी राजकुमार और राजा साथ मिलकर आपकी रियासत को जला डालेंगे।’ जरासंध को पता था कि यह सच है। हालांकि वह बहुत गुस्से में था, मगर उसका विवेक और बुद्धि इतनी काम कर रही थी कि वह इन बातों पर विचार कर पाता। अगली सुबह वह द्रुपद के पास गया, उन्हें बहुमूल्य उपहार दिए और शालीनतापूर्वक वहां से चला गया।

श्री कृष्ण कभी भी महाभारत जेसा भयानक युद्ध नही चाहते थे । उन्हे अच्छी तरह पता था की युद्ध किसी भी तरीके से समजदारी का निर्णय नही हो सकता ।

तो कृष्ण इस तरह के इंसान थे। उन्होंने युद्ध टालने की हर संभव कोशिश की, मगर जब इसके बावजूद युद्ध की नौबत आई, तो पीछे हटना कोई समझदारी नहीं थी। वह एक भयानक युद्ध था, जहां लगभग हर कोई मारा जाने वाला था, लेकिन यदि वे पीछे हटते, तो भी वे मारे जाते। कृष्ण ने यही समझाने की कोशिश की।

Friday, 10 February 2017

महाशिवरात्रि की पौराणिक कथा ।


फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि भगवान शंकर का ब्रह्मा के शीश
 से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था। प्रलय की वेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव ब्रह्माड
 को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं। इसीलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा गया। कई स्थानों पर यह भी माना जाता है कि इसी दिन भगवान शिव का विवाह हुआ था | तीनों भुवनों की अपार सुंदरी तथा शीलवती गौरां को अर्धांगिनी बनाने वाले शिव प्रेतों व पिशाचों से घिरे रहते हैं। उनका रूप बड़ा अजीब है। शरीर पर मसानों की भस्म, गले में सर्पों का हार, कंठ में विष, जटाओं में जगत-तारिणी पावन गंगा तथा माथे में प्रलयंकर ज्वाला है। बैल को वाहन के रूप में स्वीकार करने वाले शिव अमंगल रूप होने पर भी भक्तों का मंगल करते हैं और श्री-संपत्ति प्रदान करते हैं। साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों ने से महाशिवरात्रि की सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

शिकारी कथा

एक बार पार्वती जी ने भगवान शिवशंकर से पूछा, 'ऐसा कौन-सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे
 के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?' उत्तर में शिवजी ने पार्वती को 'शिवरात्रि' के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई- 'एक बार चित्रभानु नामक एक शिकारी था | पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।'

शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल-वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो विल्वपत्रों से ढका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला।

पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुंची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, 'मैं गर्भिणी हूं। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना।' शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई।

कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे पारधी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।' शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, 'हे पारधी!' मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो।

शिकारी हंसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे। उत्तर में मृगी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान मांग रही हूं। हे पारधी! मेरा विश्वास कर, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूं।

मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में बेल-वृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा। शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला, हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा।


मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूं।' उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गया। भगवान शिव की अनुकंपा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।


थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आंसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया। देवलोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहे थे। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प-वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए'।

Thursday, 9 February 2017

क्यु धुतराष्ट थे जन्म से अंधे ?


महाराज शांतनु और सत्यवती के दो पुत्र हुए विचित्रवीर्य और चित्रांगद। चित्रांगद कम आयु में ही युद्ध में मारे गए। इसके बाद भीष्म ने विचित्रवीर्य का विवाह काशी की राजकुमारी अंबिका और अंबालिका से करवाया। विवाह के कुछ समय बाद ही विचित्रवीर्य की भी बीमारी के कारण मृत्यु हो गई। अंबिका और अंबालिका संतानहीन ही थीं तो सत्यवती के सामने यह संकट उत्पन्न हो गया कि कौरव वंश आगे कैसे बढ़ेगा।

वंश को आगे बढ़ाने के लिए सत्यवती ने महर्षि वेदव्यास से उपाय पूछा। तब वेदव्यास से अपनी दिव्य शक्तियों से अंबिका और अंबालिका से संतानें उत्पन्न की थीं। अंबिका ने महर्षि के भय के कारण आंखें बद कर ली थी तो इसकी अंधी संतान के रूप में धृतराष्ट्र हुए। दूसरी राजकुमारी अंबालिका भी महर्षि से डर गई थी और उसका शरीर पीला पड़ गया था तो इसकी संतान पाण्डु हुई। पाण्डु जन्म से ही कमजोर थे। दोनों राजकुमारियों के बाद एक दासी पर भी महर्षि वेदव्यास ने शक्तिपात किया था। उस दासी से संतान के रूप में महात्मा विदुर उत्पन्न हुए।

लेकिन धुतराष्ट को हंमेशा यही लगता था की अंध होने की वजह से उनसे पहले पांडु को राज मिला ।

अंधे होने के कारण धृतराष्ट्र से पहले पाण्डु बने थे राजा
धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर के पालन-पोषण का भार भीष्म के ऊपर था। तीनों पुत्र बड़े हुए तो उन्हें विद्या अर्जित करने भेजा गया। धृतराष्ट्र बल विद्या में श्रेष्ठ हुए, पाण्डु धनुर्विद्या में और विदुर धर्म और नीति में पारंगत हो गए। तीनों पुत्र युवा हुए तो बड़े पुत्र धृतराष्ट्र को नहीं, बल्कि पाण्डु को राजा बनाया गया, क्योंकि धृतराष्ट्र अंधे थे और विदुर दासी पुत्र थे। पाण्डु की मृत्यु के बाद धृतराष्ट्र को राजा बनाया गया। धृतराष्ट्र नहीं चाहते थे कि उनके बाद युधिष्ठिर राजा बने, बल्कि वे चाहते थे कि उनका पुत्र दुर्योधन राजा बने। इसी कारण वे लगातार पाण्डव पुत्रों की उपेक्षा करते रहे।



Wednesday, 8 February 2017

श्री कृष्ण ने क्यों किया कर्ण का अंतिम संस्कार अपने ही हाथों पर ?



जब कर्ण मृत्युशैया पर थे तब कृष्ण उनके पास उनके दानवीर होने की परीक्षा लेने के लिए आए। कर्ण ने कृष्ण को कहा कि उसके पास देने के लिए कुछ भी नहीं है। ऐसे में कृष्ण ने उनसे उनका सोने का दांत मांग लिया।

कर्ण ने अपने समीप पड़े पत्थर को उठाया और उससे अपना दांत तोड़कर कृष्ण को दे दिया। कर्ण ने एक बार फिर अपने दानवीर होने का प्रमाण दिया जिससे कृष्ण काफी प्रभावित हुए। कृष्ण ने कर्ण से कहा कि वह उनसे कोई भी वरदान मांग़ सकते हैं।

कर्ण ने कृष्ण से कहा कि एक निर्धन सूत पुत्र होने की वजह से उनके साथ बहुत छल हुए हैं। अगली बार जब कृष्ण धरती पर आएं तो वह पिछड़े वर्ग के लोगों के जीवन को सुधारने के लिए प्रयत्न करें। इसके साथ कर्ण ने दो और वरदान मांगे।

दूसरे वरदान के रूप में कर्ण ने यह मांगा कि अगले जन्म में कृष्ण उन्हीं के राज्य में जन्म लें और तीसरे वरदान में उन्होंने कृष्ण से कहा कि उनका अंतिम संस्कार ऐसे स्थान पर होना चाहिए जहां कोई पाप ना हो।

पूरी पृथ्वी पर ऐसा कोई स्थान नहीं होने के कारण कृष्ण ने कर्ण का अंतिम संस्कार अपने ही हाथों पर किया। इस तरह दानवीर कर्ण मृत्यु के पश्चात साक्षात वैकुण्ठ धाम को प्राप्त हुए।


  • कर्ण ही कौरवों में से एक मात्र ऐसा योद्धा था जो अर्जुन को हरा सकता था । इसी वजह से कर्ण को कपट नीति से वध किया जाता हे । कर्ण को दानवीर कर्ण भी कहा जाता हे। वे अपने इस स्वभाव के लिये आज भी जाने जाते हे ।